أنا.. و نافذتي والمطر..

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بقلمي ✍️✍️

ابراهيم الجبوري.. العراق 🇮🇶
وقفت..💜
قرب.. نافذتي..
اشاهد الأمطار تهطل
ثم جلست💜
اتذكر.. حلم.. الذي..
خطرا على.. مخيلتي..
وانا.. غارق بتفكيري
ومندمج.. مع تساقط المطر
تذكرت… 💜
واخترقت.. ذكرياتي
كل تفكيري..واقول..
مع… نفسي..هل حبك
حلم..لو سراب..لو حقيقة..
وقمت افسر.. 💜
أن كان.. حلم.. اتمنى..
كل.. لحظة.. يراودني..
وان كان.. سراب..
سأبقى.. إطارده..
إلى.. ان.. ألقاه.. واحوله..
من حلم إلى…. حقيقة ..
ولا اقول على
حبك.. سراب..
تفكيري بك💜
وأصبح.. تفكيري
كشريط.. سينمائي..
يعرض ماهو.. جميل..
بين مذكراتي..
موقف المطر💜
لكن.. موقف..
. المطر.. وسقوطه..
بقى.. أجمل..
….. صورة.. طغت..
على.. ذكرياتي..
همست نفسي💜
وفقلت.. بين نفسي..
وهمست
كم جميل.. انت..
ياأيها المطر..
وقطرات.. وحبات..
كانها.. لولوة البحار..
في. بريقها.. ولمعانها
احلفك💜
احلفك.. أيها..
الغيث.. الجميل..
بأن.. تفرحني..
تقرى عيني.. بدموعها..
من الفرحة..
بلقاء..
من أحب..
لكن 💜
لكن لم يتم اللقاء
وبقى الحب ذكريات
واصبح سراب
ويا.. ليت..
يصبح حقيقة.. حبك..

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